1. अमित शाह का बयान:
गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में संविधान पर चर्चा करते हुए कहा कि “आंबेडकर का नाम लेना आजकल एक फ़ैशन बन गया है।” उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि यदि लोग भगवान का नाम इतने बार लेते तो उन्हें सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता। इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने इसे आंबेडकर का अपमान बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी।
2. विपक्ष की प्रतिक्रिया:
- कांग्रेस: मल्लिकार्जुन खड़गे ने अमित शाह के बयान को "निंदनीय" बताया और उनके इस्तीफ़े की मांग की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अमित शाह को कैबिनेट से बर्खास्त करने का आग्रह किया।
- अन्य दल: टीएमसी, समाजवादी पार्टी और बसपा जैसे दलों ने भी शाह के बयान की निंदा की। राहुल गांधी ने इसे संविधान विरोधी बताते हुए भाजपा की मंशा पर सवाल उठाया।
- मायावती: उन्होंने कहा कि आंबेडकर दलितों और उपेक्षितों के "भगवान" हैं और सभी पार्टियों को उनके प्रति सम्मान दिखाना चाहिए।
3. भाजपा का पक्ष:
- अमित शाह का जवाब: उन्होंने कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और कांग्रेस ने आंबेडकर का सम्मान कभी नहीं किया।
- पीएम मोदी की प्रतिक्रिया: मोदी ने कांग्रेस पर आंबेडकर का अपमान करने का आरोप लगाया और ऐतिहासिक घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस ने आंबेडकर को हमेशा हाशिये पर रखा।
4. ऐतिहासिक संदर्भ:
डॉ. आंबेडकर के कांग्रेस से मतभेद, विशेषकर उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफे का ज़िक्र भी इस बहस में हुआ। भाजपा ने कांग्रेस पर आंबेडकर की उपेक्षा करने और उनके विचारों को दरकिनार करने का आरोप लगाया।
5. संसद की स्थिति:
हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। विपक्ष ने संसद के बाहर धरना-प्रदर्शन किया और “जय भीम” के नारे लगाए।
विश्लेषण:
यह विवाद भाजपा और कांग्रेस के बीच आंबेडकर की विरासत पर राजनीतिक संघर्ष को उजागर करता है। यह केवल विचारधाराओं का टकराव नहीं, बल्कि दलित वोटबैंक पर पकड़ बनाने का प्रयास भी प्रतीत होता है।
निष्कर्ष:
अमित शाह का बयान और उसके बाद की प्रतिक्रियाएं राजनीति में आंबेडकर की विचारधारा और महत्व पर चर्चा को पुनर्जीवित करती हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बहस आने वाले समय में किस दिशा में जाती है।
