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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के भीतर मतभेद: सत्ता संघर्ष और विचारधारा का टकराव श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय समाचार

 
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के भीतर मतभेद: सत्ता संघर्ष और विचारधारा का टकराव

श्रेणी: अंतर्राष्ट्रीय समाचार


अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के अंदरूनी मतभेद एक बार फिर चर्चा का विषय बन गए हैं। इस महीने काबुल के एक मदरसे में हुए एक कार्यक्रम के दौरान तालिबान के दो प्रमुख नेताओं, सिराजुद्दीन हक़्क़ानी और निदा मोहम्मद नदीम, के बीच तल्ख़ बयानबाज़ी ने इन मतभेदों को उजागर किया।

तालिबान के भीतर दो ध्रुव

  1. हक़्क़ानी गुट की नाराज़गी
    तालिबान के गृह मंत्री और हक़्क़ानी नेटवर्क के प्रमुख सिराजुद्दीन हक़्क़ानी ने कार्यक्रम में कड़े शब्दों में तालिबान नेतृत्व पर निशाना साधा। उन्होंने "संकीर्ण मानसिकता" और "धर्म का एकाधिकार" रखने का आरोप लगाते हुए कहा कि तालिबान को लोगों की समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए।

    सिराजुद्दीन का यह बयान कंधार में तालिबान के शीर्ष नेता हिबतुल्लाह अख़ुंदज़ादा के साथ उनकी कथित असफल बैठक के बाद आया।

  2. निदा मोहम्मद नदीम का कड़ा रुख
    तालिबान के उच्च शिक्षा मंत्री निदा मोहम्मद नदीम ने कार्यक्रम में तालिबान विरोधियों को "इस्लाम और अल्लाह का दुश्मन" बताते हुए उनकी आलोचना की। उन्होंने सख़्त लहज़े में कहा कि केवल धार्मिक नेताओं को ही "भ्रष्ट और काफ़िर" लोगों के ख़िलाफ़ लड़ने का हक़ है।

मतभेदों के कारण

  • महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध:
    तालिबान सरकार के भीतर महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों को लेकर मतभेद स्पष्ट हैं। निदा मोहम्मद नदीम, जो महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने के पक्षधर हैं, कंधार में तालिबान नेतृत्व के क़रीबी माने जाते हैं।

  • सत्ता का केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण:
    सिराजुद्दीन हक़्क़ानी जैसे नेता चाहते हैं कि तालिबान जनता की समस्याओं के प्रति जवाबदेह हो, जबकि कंधार सर्किल सत्ता के केंद्रीकरण और कट्टरपंथी नीतियों पर ज़ोर दे रहा है।

  • जन समर्थन का मुद्दा:
    हक़्क़ानी ने अपने भाषण में चेतावनी दी कि तालिबान जनता के सवालों का जवाब देने में विफल हो रहा है। उन्होंने नेतृत्व पर "धर्म को बदनाम करने" का आरोप भी लगाया।

तालिबान के भविष्य पर सवाल

इन मतभेदों ने तालिबान सरकार के भीतर गहरे दरारों को उजागर किया है। इससे न केवल अफ़ग़ानिस्तान की राजनीतिक स्थिरता प्रभावित हो रही है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तालिबान की छवि भी सवालों के घेरे में आ गई है।

इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि तालिबान के भीतर सत्ता और विचारधारा का संघर्ष अब सार्वजनिक मंचों पर आ चुका है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये मतभेद अफ़ग़ानिस्तान की सरकार और समाज को किस दिशा में ले जाते हैं।

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